Friday, December 03, 2010

बयान

नहीं बयान कर सके जो दास्ताँ गुज़र गई
अभी इधर थी रोशनी जाने अब किधर गई।

ये चाहते रहे कि थोड़ी छाँव राह में मिले
हमें ज़रा-सी ज़िन्दगी तो उस पनाह में मिले
जिसकी खोज में भटक रहे हैं इक सवाल से
बन गए हैं आईने के सामने मिसाल से
मगर हमारे रास्तों पे गुल कभी खिल सके
थे ख़्वाब में तो साथ हकीकतों में मिल सके

धुएँ सी बनके उड़ गईं ये मुस्कराहटें यहाँ
उनके घुंघरुओं की कभी आई आहटें यहाँ
उदास दर्द साथ हाथ की लकीर में दिखे
रहे बाज़ार में मगर कहीं कभी भी बिके
वो उड़ गए चमन से किसी तेज़ बाज की तरह
फिर दिखे वो लम्हें अपनी दूर तक नज़र गई।

नहीं बयान कर सके जो दास्ताँ गुज़र गई
अभी इधर थी रोशनी जाने अब किधर गई।

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